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शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

देवालयों के निर्माण की रूपरेखा- डॉ. श्रीकृष्ण ‘जुगनू


हमारे यहां देवालयों के कई प्रकार हैं। सांधार और निरंधार तो संज्ञाएं हैं ही, मगर लयन या लेण गृह उन गुफाआें के लिए कहा गया है जिनमें शुरू शुरू में आवास के साथ-साथ आराधना का सिलसिला शुरू हुआ था। गुप्‍तकालीन प्रमाण जाहिर करते हैं कि देवालयों के कई स्‍वरूपों का विकास हो चुका था। बृहत्‍संहिता और उसका आधार रही काश्‍यपीय संहिता में कैलास आदि दर्जनों प्रासाद शैलियों और स्‍वरूपों का वर्णन आया है। राजा भोज ने 1010 ई. के आसपास जब समरांगण सूत्रधार ग्रंथ की रचना की तो प्रासादों के देवानुसार स्‍पष्‍ट वर्गीकरण किया गया और इतने अधिक स्‍वरूपों का वर्णन किया कि उनको यदि मॉडल रूप में भी बनाया जाए तो एक भारत और चाहिए। हजारों रूप है प्रासादों के न्‍यास-विन्‍यास के। इसलिए कोई एक मंदिर दूसरे से वैसे ही नहीं मिलता जैसे एक सूरत दूसरी सूरत से नहीं मिलती। इसके विमान, देवायतन, देवालय, प्रासाद, मन्दिर आदि पर्याय हैं।
कैसे होता था इनका निर्माण ?
 शास्‍त्रों में इनके तलच्‍छन्‍द और स्‍वरूप का ही वर्णन मिलता है, मगर ये सच है कि प्रासादों के निर्माण से पूर्व उनका नक्‍शा तैयार किया जाता था। नक्‍शों का प्रारंभिक जिक्र 'मिलिन्‍द पन्‍हो' में आता है। तब नगर वढ्ढकी या नगर निवेशक (नगरवर्धकी) भूमि के चयन से लेकर वहां पर नगर निवेश के लिए उचित मापचित्र तैयार करता था और उपयोगी, अावश्‍यक भवनों की योजना बनाकर नवीन नगर बसने के बाद दूसरी जगह चला जाता था। सौन्‍दरानन्‍द नामक बौद्धकाव्‍य और उसके समकालीन हरिवंशपुराण में 'अष्‍टाष्‍टपद' के रूप में नगर, राजधानी आदि की योजना कल्पित करने का प्रसंग आया है। यह 8 गुणा 8 यानी चौंसठ पद वास्‍तुन्‍यास होता था...। इसी आधार पर कपिलवस्‍तु और द्वारका की योजना तैयार हई थी।
राजा भोज के काल में ही भोजपुर का शिव मन्दिर बना। यह अपने सौंदर्य और शिल्‍प ही नहीं, स्‍थापत्‍य के लिए भी एक मानक शिवायतन के रूप में जाना जाता है। इस मंदिर की विशेषता यह भी है कि इसके स्‍थापत्‍य के लिए पास की एक चट्टान पर नक्‍शा तैयार किया गया था। मंदिर की पूरी योजना को अलग-अलग रूप में तय किया गया और शिवलिंग से लेकर द्वार, दीवार, शिखर तक को परिकल्पित किया गया। समरांगण सूत्रधार में जिन प्रासादों के रूपों का लिखा गया है, उनमें शिवालयों के प्रसंग में इस प्रासाद की रचना और उसके नक्‍शे से शब्‍दों सहित योजना विधान को समझा जा सकता है।

यह प्रासाद दर्शन मेरे समरांगण सूत्रधार के अनुवाद (प्रकाशक- चौखम्‍बा संस्‍कृत सीरिज ऑफिस, वाराणसी) के समय बहुत काम आया। दो साल पहले, 2012 के अगस्‍त के पहले हफते में मैं भोपाल के कलाविद श्री सुरेशजी तांतेड और डॉ. महेंद्र भानावत के साथ भोजपुर पहुंचा तो यह सब देखकर विस्मित हो गया। मेरे आग्रह पर मित्र Gency Chaudhuri ने इन नक्‍शों के चित्रों को भेजा है,,, आप भी प्रासाद स्‍थापत्‍य विधान के मूलाधार तलच्‍छन्‍द की योजना का आनंद उठाइयेगा।


-डॉ. श्रीकृष्ण ‘जुगनू'

बुधवार, 24 दिसंबर 2014

नागर, द्राविड और वेसर प्रासाद शैलियां

मंदिरों के निर्माण का अपना वैशिष्‍ट्य रहा है। युगानुसार भी और क्षेत्रानुसार भी उनका निर्माण होता रहा है। वे तल या अधिष्‍ठान से लेकर शिखर या स्‍तूपी तक अपना आकार मानव के शरीर के रचना की तरह ही अपना स्‍वरूप रखते हैं। उनकी सज्‍जा या अलंकरण का अपना खास विधान रहा है और इसके लिए शिल्पियों ने अपने कौशल को दिखाने में प्रतिस्‍पर्द्धा सी की है।

प्रासादों के स्‍वरूप के निर्णय के लिए हमें हमारे शिल्‍प ग्रंथों को जरूर देखना चाहिए जिनमें उनके रचनाकाल से पूर्व की परंपराओं को लिखा गया है। मयमतं हो या मानसार या फिर शैवागम अथवा वैष्‍णवागम हों, उनमें प्रासादों की रचना के लिए पर्याप्‍त विवरण मिलता है। दक्षिण के नारायण नंबूदिरीपात ने 'देवालय चंद्रिका' में प्रासादों के शिल्‍प के लिए निर्देश किए हैं तो सूत्रधार मंडन ने 'प्रासादमण्‍डनम्' में प्रासादों के संबंध में समग्र योजना और कार्यविधि को लिखा है। संयोग से इन दोनों ही ग्रंथों के संपादन का मुझे सौभाग्‍य मिला है।

इन दिनों शिल्‍परत्‍नम पर काम चल रहा है। इसकी रचना 16वीं सदी की हैं। इसमें कहा गया है 1. नागर, 2. द्राविड और 3. वेसर शैलियों के मंदिर भारत में बनते आए हैं, मगर सबका अपना अपना स्‍वरूप रहा है। लाख प्रयासों के बावजूद शिल्पियों ने अपने ढंग से ही मंदिरों की रचना की है। मानव की तरह ही उनके रूप रंग में कुछ न कुछ भेद मिलता ही है। यही कारण है कि समरांगण सूत्रधार में मंदिरों के संबंध में जो विवरण है, उनको यदि नमूने के तौर पर भी बनाया जाए तो एक भारत कम पड़ जाए...। ऐसा ही विस्‍तृत विवरण ईशान शिवगुरुदेव पद्धति में मिलता है जिसके उत्‍तरार्ध का क्रियापाद अधिकांशत: देवालयों से संबंध रखता है।

शिल्‍परत्‍नकार श्रीकुमार का मत है कि हिमालय से लेकर विंध्‍याचल तक सात्विक गुणों के नागर, विंध्‍याचल से लेकर कृष्‍णा तक राजस गुणों के द्राविड और कृष्‍णा से लेकर कन्‍यान्‍त तक तामस गुणों वाले वेसर शैली के प्रासादों के निर्माण की परंपरा रही है -
 
नागरं सात्विके देशे राजसे द्राविडं भवेत्। वेसरं तामसे देशे क्रमेण परिर्की‍तिता:।।
 
इसी प्रकार की मान्‍यताएं 8वीं सदी के ग्रंथ 'लक्षण सार समुच्‍चय' में आई हैं...।
आज इतना ही, कभी फिर।
 
- डॉ: श्रीकृष्‍ण जुगनू

द्राविड़ प्रासाद : रचनात्‍मक स्‍वरूप

शिल्‍प शास्‍त्रों में जिन तीन प्रकार के प्रासादों का उल्‍लेख मिलता है, उनमें द्राविड या द्रविड़ शैली के प्रासाद विंध्‍याचल से कृष्‍णा तक के प्रदेश में करणीय बताए गए हैं।
 
अजितागम नामक शैव आगम में आया है कि वे प्रासाद जिनमें कण्‍ठ आदि का निर्माण अष्‍टकोणीय रूप में हो, वे द्राविड़ प्रासाद कहे जाते हैं :
 
कण्‍ठात्‍प्रभृति चाष्‍टाश्रं द्राविडं परिकीर्तितत्। (क्रियापाद, 12, 67)
 
इसी प्रकार सुप्रभेदागम में आया है : 
 
ग्रीवमारभ्‍य चाष्‍टाश्रं विमानं द्राविडाख्‍यकम्। (सुप्रभेद. 1, 31, 40)
 
करणागम में मामूली भेद से कहा गया है : 
 वेदि प्रभृति चाष्‍टाश्रं द्राविडं चेति कीर्तिततम्। (करण. 1, 7, 117)
 
इन्‍हीं प्रासादों में अन्‍य रूपों को आरोपित करते हुए अन्‍य रूपों का विन्‍यास किया जाता रहा है, जैसे सौभद्र, स्‍वस्तिकबंध, सर्वतोमुख, सार्वकामिकम् आदि। शैवागमों में इस प्रकार की मान्‍यताओं का सर्वाधिक वर्णन मिलता है, कारण है कि शिवलिंग की स्‍थापना और उनका पूजा विधान का प्रसार करना। कामिकागम इनमें सबसे पुराना विवरण लिए है और अंशुमद्भेदागम जैसे अन्‍य आगम उसी का आश्रय ग्रहण किए हैं। मयमतं, मानसार जैसे शिल्‍पग्रंथ और तंत्र समुच्‍चय आदि में भी यह विवरण मिल जाता है।
 
द्राविड़ प्रासादों में भी मनुष्‍य के शरीर के अंगों का ऊर्ध्‍वाधर विन्‍यास मिलता है। एक प्रासाद अपने रूप में मानवीय संरचना ही लिए होता है। एक द्राविड प्रासाद का रेखांकन इस मान्‍यता को सिद्ध करने में सहायक है। देखियेगा कि चरण से लेकर सिर तक के अंग प्रासाद में कौन-कौन से और कैसे-कैसे होते हैं, ये ही पर्यायवाची शिल्‍पग्रंथों में प्रयुक्‍त हैं -
 
  • उपपीठ (पांव तल),
  • अधिष्‍ठान (तल से ऊपरीभाग जिसमें पीठ, उपान, प्रति अंग होते हैं),
  • जानु मण्‍डल (जंघा भाग),
  • पादवर्ग (पांव, स्‍तम्‍भ, अंघ्रि, चरण),
  • कराकरम् (भुजाएं, न्‍यग्रोध),
  • प्रस्‍तार व बाहुमूलम (भुजाएं),
  • कण्‍ठ (गल या ग्रीवा),
  • गुल (ठुड्डी),
  • आस्‍य (मुख भाग),
  • महानासी या अल्‍पनासी (नाक, नासिका),
  • कर्ण (कान),
  • शिखर (सिर का भाग),
  • शृंग, उरुशृंग (शिरोपरिभाग),
  • स्‍तूपी (सिर के केश आदि),
  • शिखा या ध्‍वजा (सिर के ऊंचे, खुले केश)।
 
प्रासाद का यह रूप जहां भी मिलता है, वह एक काया रचना ही लगता है, देखियेगा। भारतीय और मिस्र आदि के प्रासादो में तुलनात्‍मक रूप में यह अंतर बहुत अधिक है। इसके अंगों के ताल और मान पर हजारों श्‍लोक मिल हैं और सबमें अनुपात पर ही जोर दिया गया है,,, वह विवरण कभी फिर।
 
- डॉ. श्रीकृष्‍ण 'जुगनू'

प्रासाद स्‍तवन - आठ-आठ देव प्रासाद

धार के परमार नरेश राजा भोज (1015-1045 ई.) के लिखे 'समरागण सूत्रधार' में प्रासादों की प्रशस्ति में ऐसे 64 प्रकार के मंदिरों का उल्‍लेख है जो प्रशंसा के योग्‍य हैं। इसमें चौंसठ मंदिरों का जिक्र है और उनको संबंधित देवताओं के लिए बनाने का निर्देश है। प्रत्‍येक देवता के लिए आठ आठ प्रकार के प्रासाद बताए गए हैं। ये प्रासाद शिव, विष्‍णु, ब्रह्मा, सूर्य, चंडिका, गणेश, लक्ष्‍मी और अन्‍य देवताओं के लिए हैं। प्रासादों की शैली या देवताओं की प्रतिष्‍ठा के अनुसार उनके लक्षणों को पहचाना जा सकता है।
  • 1. शिव प्रासाद - विमान, सर्वतोभद्र, गजपृष्ठ, पद्मक, वृषभ, मुक्‍तकोण, नलिन और द्राविड।
  • 2. विष्‍णु प्रासाद - गरुड, वर्धमान, शंखावर्त, पुष्‍पक, गृहराज, स्‍वस्तिक, रुचक और पुंडवर्धन।
  • 3. ब्रह्मा प्रासाद - मेरु, मंदर, कैलास, हंस, भद्र, उत्‍तुंग, मिश्रक व मालाधर।
  • 4. सूर्य प्रासाद - गवय, चित्रकूट, किरण, सर्वसुंदर, श्रीवत्‍स, पद्मनाभ, वैराज और वृत्‍त।
  • 5. चडिका प्रासाद - नंद्यावर्त, वलभ्‍य, सुपर्ण, सिंह, विचित्र, योगपीठ, घंटानाद व पताकिन।
  • 6. विनायक प्रासाद - गुहाधर, शालाक, वेणुभद्र, कुंजर, हर्ष, विजय, उदकुंभ व मोदक।
  • 7. लक्ष्‍मी प्रासाद - महापद्म, हर्म्‍य, उज्‍जर्यन्‍त, गन्‍धमादन, शतशृंग, अनवद्यक, सुविभ्रान्‍त और मनोहारी।
इसके अलावा वृत्‍त, वृत्‍तायत, चैत्‍य, किंकिणी, लयन, पट्टिश, विभव और तारागण नामक प्रासाद और बताए गए हैं जो सभी देवताओं के लिए हो सकते हैं। यहां लयन प्रासादों का विवरण रोचक है, यह पर्वतों को काटकर बनाए गए गुहागृहों या प्रासादों के लिए है (जैसा कि अलोरा का चित्र दिखा रहा है), ये कौतुक है या सचमुच,,, बस सोचना है।
इसके बारे में कभी फिर...

 

प्रासादों के आठ शिखर : प्रादेशिक आधार पर नामकरण

हमारे यहां प्राचीन शिल्‍पशास्‍त्रों में प्रासादों के आठ प्रकार के शिखरों के नाम उनकी ऊंचाई के अनुसार मिलते हैं। यह संयोग ही है कि 10वीं शताब्‍दी तक जिन-जिन प्रदेशों में जो जो शिल्‍पी अपनी परंपरा में जिस किसी शैली और सुविधा के अनुसार शिखर का निर्माण करते थे, उनका नामकरण उसी आधार पर हुआ।

प्रासादों के प्रादेशिक स्‍वरूप के अध्‍ययन के लिए ये नाम बहुत ही उपयोगी हैं। इनमें उस क्षेत्र के प्राचीन शिल्‍प स्‍वरूपों काे भी खोजा जा सकता है। यही नहीं, यह परंपरा वहां मौजूद प्रासादों की परंपरा की परिचायक भी हैं- पांचालं चापि वैदेहं मागधं चापि कौरवम्। कौसलं शौरसेनं च गान्‍धारावन्तिकं तथा।। यथाक्रमेण नामानि ज्ञातव्‍यानि विचक्षणै:।। (मयमतं 18, 10-11 एवं शिल्‍परत्‍नम् 32, 7-8) ये नाम हैं -

  • 1. पांचाल - पंचाल देश में बनने प्रासादों के शिखर,

  • 2. वैदेह- वैदेह के आसपास बनने वाले मंदिरों के शिखर,

  • 3. मागध - मगध के परिक्षेत्र में निर्मित होने वाले प्रासादों के शिखर,

  • 4. कौरव - कुरूक्षेत्र के समीपवर्ती इलाकों में बनने वाले मंदिरों का शिरोभाग,

  • 5. कौसल - कौसल, अवध-अयोध्‍या के इलाके में बनने वाले प्रासादों का शिखर स्‍वरूप,

  • 6. शौरसेन - मथुरा, इंद्रप्रस्‍थ के आसपास बनने वाले प्रासादों के शिखर रूप,

  • 7. गान्‍धार - अफगानिस्‍तान के आसपास के इलाके के प्रासादों के शिखर,

  • 8. आवन्तिक - उज्‍जैन, मालवा के आसपास के इलाकों में बनने वाले मंदिरों के शिखर,

ये शिखर प्राय: आनुपातिक ऊंचाइयां लिए होते थे। यह ऊंचाई विस्‍तार से क्रमश: 3 :7, 4 :9, 5 : 11, 6 : 13, 7 : 15, 8 : 17 अथवा इससे आधे अनुपात में भी होती थी। ये आठ शिखर आठों ही आनुपातिक मान से तैयार होते थे। संयोगवश यदि कहीं कोई पुराने प्रासाद का शिखर बचा हो तो इस प्रमाण का अध्‍ययन किया जा सकता है। इनके अपने तलच्‍छन्‍द विधान भी रहा है। (जैसा कि चित्र में दिखाया गया है) यह जिक्र.. फिर कभी।