शिल्पकला लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
शिल्पकला लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 5 अप्रैल 2015

यशद की खान में यशकारी प्रासाद

दुनिया में यशद की सर्वप्रथम सौगात देने वाले 'जावर' क्षेत्र की ख्‍याति श्रेष्ठियों के संघ में जिनालयों और अंत:पुर निवासिनी रानियों के संकुल में महाराणा कुंभा की पुत्री रमाबाई के प्रासादोपहार के लिए रही है। उदयपुर जिले की सराड़ा तहसील में अपनी प्राचीनतम पत्‍थर खदानों के लिए बाबरमाल और धातु खदानों के लिए जावरमाल की ख्‍याति रही है। यही जावर मध्‍यकाल में चांदी जैसा उगलने वाला रहा जहां की चंद्रमा सी चमक वाली चांदी की ख्‍याति के चर्चे अरब तक 7वीं सदी तक होते थे और व्‍यापारी विमर्श करते थे कि मेवाड़ वाले चांदी का व्‍यापार सोने के साथ करते हैं, खैर धातुओं के लिए मेवाड़ की दरीबा और आगूंचा की खाने में सदियों पहले पहचान बना चुकी थी, मगर उनको खूब छुपाकर रखा गया था...।

 चैत्र की नवरात्रा में जावर इसलिए याद आया कि इन्‍हीं दिनों में यहां रमाबाई ने दामोदरराय का मंदिर कुंड सहित बनवाकर उसकी प्रतिष्‍ठा की थी। विक्रम संवत् 1554 का वर्ष और सूर्य की तिथि सप्‍तमी थी। गणना के अनुसार यह दिन शनिवार, 11 मार्च, 1497 ईस्‍वी था। यूं तो चैत्र में वास्‍तुकर्म निषिद्ध माना जाता है किंतु यहां मिला शिलालेख एक मात्र प्रमाण है कि इस माह में भी वास्‍तु प्रतिष्‍ठा का कार्य हुआ और वह भी बहुत बड़े पैमाने पर जिसमें दूर दराज से प्रतिष्‍ठाकर्मियों को बुलाया गया और उनको सुवर्ण के तार वाले वस्‍त्र, दुकूल आदि का वितरण किया गया। जावर की प्रसिद्ध प्रशस्ति उस काल के महान्‍यायविद महेश्‍वर दशोरा ने लिखी थी जो 40 श्‍लोक वाली है। इस प्रशस्ति में रमाबाई के गुण-चरित्र आदि बारे में पर्याप्‍त जानकारियां आलंकारिक रूप में लिखी गई है, पिछले दिनों इस प्रशस्ति का संपादन सहित पूरा अनुवाद भी किया था। हालांकि यह आज खंडित हो चुकी है। वर्तमान में यह मंदिर क्षेत्र रमानाथ मंदिर और रमानाथ कुंड के नाम से ही जाना जाता है। यह वर्तमान में राज्‍य पुरातत्‍व विभाग के अधीन है।

 इतिहास में रमाबाई की ख्‍याति वल्‍लकी नामक वीणा वादिका के रूप में रही है। संयोग से इस काल की अधिकांश देवांंगनाओं की प्रतिमाओं में वीणावादिकाओं का मनोहारी चित्रण मिलता है। उसकी ख्‍याति महाराणा कुंभा (1433-68 ई.) की पुत्री होने के साथ ही गुजरात-मेवाड़ के बीच बेटी संबंध के नाते भी रही है। जूनागढ़ के मंडलीक राजा से उसका विवाह हुआ। जब मंडलीक विधर्मी हो गया तो रमाबाई मेवाड़ लौट गई और गुजरात की वैष्‍णवीय भक्त्‍िा परंपरा के फलस्‍वरूप शैवधर्मावलम्‍बी मेवाड़ में विष्‍णु मंदिरों का सिलसिला शुरू किया, इसे खासकर महिलाओं के द्वारा निर्माण का क्रम माना जा सकता है। बाद में राजपरिवारों की नारियों में विष्‍णु मंदिरों का निर्माण की परंपरा बलवती हो गई। इस काल की दामोदरराय की प्रतिमाएं चित्‍तौड़ के कुंभस्‍वा‍मी मंदिर मे देखी जा सकती है। बाद में इसी परिवार की मीराबाई ने भी वैष्‍णव भक्ति मार्ग को ही अपनाते हुए खुलकर कहा -
 
' माई, मैं लियो गोविंदो मोल, कोई कहे छाने, कोई कहे चौड़े, मैं लियो बजन्‍ता ढोल...।'
 
रमानाथ का यह मंदिर पूर्वाभिमुख है और कभी पंच मंदिरों के समूह का परिचायक रहा है। सूत्रधार मंडन के पुत्र सूत्रधार ईश्‍वर को इसके निर्माण का श्रेय है जिसने 'प्रासाद मंडनं' ग्रंथ के निर्देशों के अनुसार शिखरान्वित मंदिर का निर्माण किया...। मंदिर का विवरण फिर कभी। जय- जय।

 (आदरणीय प्रो. पुष्‍पेंद्रसिंहजी राणावत साहब का आभार, उन्‍होंने याद दिलाया कि सप्‍तमी को इस रमानाथ मंदिर की स्‍थापना तिथि है तो क्‍यों न रमाबाई का पुण्‍यस्‍मरण कर लिया जाए, मुझे प्रियवर अरविंदकुमार भी याद आ रहे हैं जिन्‍होंने यह चित्र भेजा और प्रशस्ति का पाठ भी अनुवाद के लिए भेजा था।)

गरुड स्‍तम्‍भ

विष्‍णु को गरुडध्‍वज भी कहा जाता है। भारतीय परंपरा में जिस-जिस देवता का जो-जो वाहन है, उसी से उसके ध्‍वज या चिन्‍ह की पहचान होती है। शिव वृषभध्‍वज है, ब्रह्मा हंसध्‍वज, कामदेव मकरध्‍वज, कार्तिकेय मयूरध्‍वज...। बहुत पहले जबकि पाणि‍नि का काल था, वासुदेव के नाम से ही विष्‍णु वासुदेवकों में उपास्‍य थे। यह श्रीकृष्‍ण के वसुदेव पुत्र होने का नाम था और इनके इसी नाम की उपासना पर जोर था। घोसुंडी के शिलालेख में भी यही नाम आया है मगर वहां संकर्षण के बाद में वासुदेव का स्‍मरण है। और, इस मत तथा इसके भागवतीय दर्शन का प्रसार विदेश तक हो चुका था। वहां विष्‍णु को गरुडारूढ के रूप में जाना गया था और उनके अनुयायी भागवतीय कहे जाते थे। जैसा कि हेलियोडोरस के अभिलेख से ज्ञात होता है।

यवनदूत हेलियोडोरस तक्षशिला के विदेशी शासक अंतलिकित का दूत था। उसने लगभग दूसरी सदी ईसा पूर्व में बेसनगर जिला भिलसा, विदिशा में गरुडध्‍वज बनवाकर अपनी आस्‍थाओं का परिचय दिया था। विदेशी वासुदेव के प्रचार क्षेत्रों की यात्रा करना, वहां निर्माण कार्य करवाना और अपनी ओर से स्‍थायी स्‍मृति के रूप में पाषाणबद्ध कार्य करवाना अपना कर्तव्‍य समझने लगे थे, यह परंपरा तब बौद्धों में भी थी।

अभिलेखीय प्रमाणों से विदित होता है कि इस गरुडध्‍वज के बाद वासुदेव, जो विष्‍णु के रूप में ध्‍येय-ज्ञेय हुए, को गरुडवाहन के रूप में इतनी ख्‍याति मिली कि जहां कहीं वैष्‍णव मंदिरों का निर्माण हुआ, उनके साथ गरुड भी विराजित हुए। भागवतों या वासुदेवकों में तब 'जयसंहिता' (मूल महाभारत) के पठन-पाठन की परंपरा थी। उसके उन श्‍लोकों या पदों का प्रचार लिखकर करवाया जाता था जो जीवन में ध्‍येय के रूप में आवश्‍यक थे। यथा : त्रीणि अमृत पदानि इह सुअनुष्ठितानि नयन्ति स्‍वर्गं - दम: त्‍याग: अप्रमाद:। (तुलनीय- महाभारत, गीता, धम्‍मपद) यह पंक्ति हेलियाडोर के स्‍तंभ से है।

यद्यपि यह कार्य अशोक के बाद हुआ मगर, इस दृष्टि से मायने रखता है कि इस कार्य को विदेशी लोग भारत में करवाने के इच्‍छुक थे, ग्रीक की कथाओं में तक श्रीकृष्‍ण के आख्‍यान उनके 'जय' नाम से मिलते हैं, यह पर्याय गोपालसहस्रनाम आदि में आया है। जय संहिता से ही श्रीकृष्‍ण के लीला चरितों का पता होता था, यही ग्रंथ गुप्‍तकाल तक भारतीय कथाओं का रूप होकर सामने आया और जैसा कि बाणभट्ट कहता है- उज्‍जैन में इसकी कथा को मंगलसूचक मानकर पढ़ा-पढ़ाया जाने लगा था। आज इतना ही... जय जय।

दुर्भेद्य दुर्गों की कहानी

किले हमारे अतीत के गौरव हैं। दुर्ग, द्वंद्व, गढ़, आदि भी इसके पर्याय हैं किंतु किले से मूल आशय था कि जिस जगह को कील की तरह स्थिर कर दिया गया हो अथवा जहां से नजर रखी जा सके। दुर्ग से आशय था जहां पहुंचना दुर्गम हो। गढ़ मूलत: गढने या बनाने का अर्थ देता है। यह शब्‍द पश्चिम भारत में लोकप्रिय रहा, गुजरात और सिन्‍ध से लेकर पेशावर तक गढ शब्‍द ख्‍यात रहा है। लोक में गढ़ी या गढ्ढी भी प्रचलन में रहे। 15वीं सदी मे लिखित *'राजवल्‍लभ वास्‍तुशास्‍त्रं', 'वास्‍तुमण्‍डनम्' आदि में गढ़ को ही संस्‍कृत रूप में काम में लिया गया है। दुर्ग को शक्ति का साम्राज्‍य माना गया, प्राय: राजा जो खेतपति, खत्तिय से क्षत्रिय बना है, यहां पर अपने चतुरंगिणी सैन्‍यबल को रखता, उसका नियंत्रण करता और 'खलूरिका' से उनका मुआयना करता। सैनिकों की सहायता के लिए कई शिल्पियों, कारीगरों, जिनगरों आदि सेवादारों को वैसे ही रखा जाता था जैसे कि आज सेना या पुलिस में रखा जाता है। यह सब राजाश्रयी वेतन अथवा जागीर को प्राप्‍त करते थे और अपने को 'राज' से संबद्ध मानते। यह मान्‍यता कई कथा रूपों में आज भी अनेक जातियों में प्रचलित है।

 दुर्ग मुख्‍यत: सुरक्षा की जरूरत की खोज रहा है। शत्रुओं को जिस किसी भी तरह धोखे में रखने का ध्‍येय भी रहता था। ऋग्‍वेद आदि से विदित होता है कि इंद्र ने सुरक्षा के लिए पुरों का महत्‍व समझा और उसने स्‍वयं पुरों का ध्‍वंस किया। यही बात कालांतर में मेरू पर्वत को दुर्ग बनाकर देवताओं को सुरक्षित करने के रूप में पुराणों का विषय बनी। पुर, परिक्‍खा, काण्‍डवारियों, कपिशीर्षों वाले वप्र या दीवार, समुन्‍नत द्वार, हर्म्‍य-हवेलियां, वरंडिका, रथ्‍या, नागदंत वाले प्रोली-प्रतोली, मंदिर-प्रासाद, भाण्‍डागार जैसी रचनाएं दुर्ग का अंग बनी। मेरू पर्वत का आख्‍यान चीन और भारत से लेकर यूनान तक समानत: प्रचलित रहा है। कहीं न कहीं इसके मूल में समूचे क्षेत्र की परंपराएं समान रही किन्‍तु आवश्‍यकताओं के अनुसार निर्माण में भेदोपभेद मिलते हैं। 

चाणक्‍य के अर्थशास्‍त्र, उसी पर आधारित कामंदकीय नीतिसार, मनुस्‍मृति, देवीपुराण, मत्‍स्‍पुराण, रामायण, महाभारत, हरिवंश आदि में प्रारंभिक तौर पर दुर्गों का विस्‍तृत वर्णन क्‍या बताता है। राज्‍य सहित राजाओं के कुल की सुरक्षा के लिए एकानेक दुर्ग विधान से किलों को बनाने का वर्णन यह जाहिर करता है कि ये निर्माण राज्‍य की दृढता के परिचायक थे और इन्‍हीं की बदौलत कोई राजा दुर्गपति, दुर्गस्‍वामी या भूभुजा कहा जाता था। 'दुर्गानुसारेण स्‍वामि वा राट्' कहावत से ज्ञात होता है कि जिसके पास जितने दुर्ग, वह उतना ही बड़ा राजा या महाराजा। महाराणा कुंभा (1433-1568 ई.) ने 'दुर्गबत्‍तीसी' का विचार देकर भारतीय दुर्ग परंपरा में नया अध्‍याय जोड़ा।

प्रारंभ में लकड़ी के दुर्ग बनते थे जिनको शत्रुओं द्वारा जला दिए जाने का भय रहता था। अशोक के समय पत्‍थरों का प्रयोग आरंभ हुआ किंतु बालाथल जैसे पुरास्‍थलों पर जो ऊंचाई वाली प्राकार युक्‍त भवन रचनाएं मिली हैं, वे प्राचीन है। गुप्‍तकाल में दुर्गों का निर्माण अधिक रहा, कई बार इनको 'विजय स्‍कंधावार' के रूप में भी जाना गया जो जीते हुए किले होते थे या राजा के निवास या फिर छावनियां होती थीं। भोजराज ने तो राजा के प्रयाणकाल में विश्राम के दौरान डेरों को यह संज्ञा दी है किंतु उसने विवरण अर्थशास्‍त्र से ही ग्रहण किया है। सल्‍तनतकाल में दुर्गों के भेदन की विधियों का वर्णन मिलता है। साबात और सुरंग की विधि से दुर्गों को तोड़ने का जिक्र मुगलकाल में बहुधा मिलता है। इसी काल में दुर्ग जीतने का जिक्र ' कंगूरे खंडित करना' जैसे मुहावरे से दिया जाता था।

किलों की रचना में प्राकार को बहुत मोटा बनाया जाता था। आक्रमणों में इनके टूटने पर रातो रात निर्माण कर लिया जाता था। इनके साथ ही सह प्राकार हाेता था जिन पर सैनिक घूम सकते थे। मंजनिकों से पत्‍थर बरसा सकते थे। इसी का उपयोग बाद में तोपों को दागने के लिए किया गया जिनमें अंग्रेजों ने नवाचार किया। हालांकि इसका प्रारंभ मुगलों के काल में हो चुका था। दुर्गों के द्वार पर शत्रुओं की खोपडि़यां लटकाकर भय उत्‍पन्‍न करने का चलन भी इसी दौरान सामने आया जबकि पहले अर्गला भेदन को ही प्राथमिकता दी जाती थी। इसमें द्वार तोड़ने और उसके अंदर लगी पत्‍थर की आड़ी पट्टिकाओं को तोड़कर सेना का आवागमन निर्बाध कर दिया जाता था। ये पट्टिकाएं ही अर्गला कही जाती थी, हालांकि मूलत: इसका आशय द्वार के पीछे बंद करने के लिए लकड़ी या लोहे की पट्टिका से लिया जाता था...।

  है न दुर्भेद्य दुर्गों का रोचक विवरण..... और हम कितना जानते हैं, केवल देखकर ही कल्‍पना कर लेते हैं। इनके साथ नरबलियों के प्रसंग भी कम नहीं जुड़े हैं, मगर क्‍यों है, कई सवाल हैं जो दुर्ग की दीवार की तरह भेदने बाकी हैं, तो बताइयेगा और अपने देखे दिखाए किसी दुर्ग के बारें में मुझे भी जरूर बताइयेगा। मेरे यहां तो चित्‍तौड़गढ़ 7वीं सदी में बना, आखिरी किला सज्‍जनगढ़ 1885 में बना, जबकि ईसापूर्व का बालाथल पुरास्‍थल मेरे बहुत ही निकट है... जय-जय।
-----------------------------------
* राजवल्‍लभ वास्‍तुशास्‍त्रम़ (डॉ. श्रीकृष्‍ण जुगनू),
*वास्‍तुमण्‍डनम् (डॉ. श्रीकृष्‍ण जुगनू)

शनिवार, 21 मार्च 2015

अहल्‍याबाई का शिलालेख

शिवपूजा में सदा निरत रहने वाली भगवती स्‍वरूपा अहल्‍या बाई का एक अभिलेख मित्रवर श्री राज्‍यपाल शर्मा (झालावाड़) ने भिजवाया है। यह जाम गेट महू के द्वार पर लगा है और देवनागरी के स्‍पष्‍टाक्षरों में संस्‍कृत भाषा में लिखा गया है। इसमें संवत लिखने में ही दो श्‍लोकों का प्रयोग किया गया है। विक्रम और शक दोनों ही संवतों का प्रयोग किया गया है, विक्रम संवत 1847 के माघ मास की 13वीं तिथि को इसको लिखा गया है। द्वार की प्रशंसा में मनोहर शब्‍द मात्र लिखा गया है।
मूलपाठ इस प्रकार है :
श्री।
श्रीगणेशाय नम:।।
स्‍वस्ति श्रीविक्रमार्कस्‍य संमत्
1847 सप्‍ताब्धिनागभू:।
शाके 1712 युग्‍मकुसप्‍तैक मिते
दुर्मति वत्‍सरे। माघे शुक्‍ल त्रयोदश्‍यां पुष्‍यर्क्षे
बुधवारे सुबा (स्‍नुषा)* मल्‍लारि रावस्‍य खंडेरावस्‍य वल्‍लभा।। 2।।
शिव पुजापरां नित्‍यं ब्रह्मप्‍याधर्म तत्‍परा।
अहल्‍यारग्राबबंधेदं मार्ग द्वार शुशोभनम़।। 3।।

अहल्‍याबाई ने कई निर्माण कार्य करवाए, उनमें द्वार रचना भी हुई है। इस शिलालेख में स्‍नुषा शब्‍द आया है जिसका आशय है कि पुत्रवधू,, संध्‍या सोमन ने इस इस शब्‍द की ओर ध्‍यान दिलाया है, तदर्थ आभार।

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

यों बनाई जाती थी प्रतिमाएं-

प्रतिमा का निर्माण नि:संदेह कठिन काम होता था। इसमें चित्रांकन, ताल-मान और शास्‍त्रीय स्‍वरूप निर्देश का ज्ञान आवश्‍यक होता है। भारतीय प्रतिमा शात्रों में ऐसा जिक्र है, इसीलिए हमारे यहां मूर्तिशास्‍त्रों से पहले चित्रशास्‍त्रों की परिकल्‍पना और रचना की गई। नग्‍नजित का विश्‍वकर्मीय चित्रशास्‍त्र इसका जीवंत रूप है। विष्‍णुधर्मोत्‍तर का चित्रसूत्र, मंजुश्रीभाषित चित्रशास्‍त्रम्, सारस्‍वत चित्रशास्‍त्रम्, ब्राहमीय चित्रशास्‍त्रम् आदि भी इसके बेहतर उदाहरण हैं।
सूत्रधार के निर्देश पर चित्रकार पहले पत्‍थर पर आलेखन कार्य करता। मेवाड़ के सूत्रधारों के अनुसार इस प्रक्रिया को 'डाकवेल' कहा जाता था। इसके बाद, तक्षक चीराई का काम करता और शिल्‍पी इसको गढ़ने का काम करता था। वह पत्‍थर को मुलायम रखने के लिए पानी का बेहतरीन तरीके से प्रयोग करता था ताकि मूर्ति श्‍लीष्‍ट, मुलायम बने। सम्‍पूर्ण लक्षण सम्‍मत रूपाकार होने पर ही प्रतिमा का उपयोग किया जाता था। अन्‍यथा उसको जलाशयों के पास किसी दीवार के काम में लाने को दे दिया जाता। जैसा कि चित्‍तौड़गढ़ में हुआ है।

हाल ही मित्रवर ललितजी शर्मा ने बिलासपुर जिला छत्तीसगढ़ के प्राचीन नगर मल्हार में एक मूर्ति का डाकवेल वाला प्रमाण खोजा है। वह बताते हैं कि पुरातात्विक प्रमाणों के आधार पर इसका इतिहास ईसा पूर्व 1000 वर्ष तक माना जाता है। यहाँ के देऊर मंदिर के द्वार पट पर उनको जस प्रतिमा का लेआऊट दिखाई वह महिषासुर मर्दिनी का है। शिल्पकार प्रतिमा बनाना चाहता था पर पता नहीं क्या कारण रहा होगा, उसने इसे अधूरा छोड़ दिया। इस तरह का ले आऊट पहली बार किसी स्थान पर देखने मिला है।

इसमें देवी का कात्‍यायनी रूप है, वही जो अलोरा से लेकर अन्‍यत्र भी लोकप्रिय रहा है। मत्‍स्‍यपुराण में इसका विवरण है जिसको देवतामूर्तिप्रकरणम में सूत्रधार मंडन ने उद्धृत किया है। इसमें देवी के बायें स्‍कंध पर शुक भी अंकित है, यह शुकप्रिया अंबिका का रूप है। इस पर आम्रलुम्बिनी परंपरा का प्रभाव होता था। देखियेगा, और अन्‍यत्र भी ऐसे रेखांकन याद कीजिएगा। मेरे लिए तो चित्‍तौड के समीधेश्‍वर मंदिर और राजसमंद झील के रेखांकन स्‍मरण में आ रहे हैं। 

मूर्तिमय मां - एक भारतीय परंपरा

भारतीय शिल्‍पशास्‍त्रों में नारी का अलंकारिक स्‍वरूप तो बनाया जाता ही है मगर उसको शिशु सहित भी दिखाया जाता है। वाराही आदि मातृका रूपों में भी ऐसा होता है मगर, मानवीय प्रतिमाओं में शिशुओं को गोद में लिए नारियों को चित्रित, उत्‍कीर्णित दिखाने की परंपरा छठवीं सदी से मिलती है। नवीं-दसवीं सदी तक तो यह छवि इतनी लोकप्रिय हो गई कि मन्दिर-मन्दिर के बाहरी जंघा भाग इन प्रतिमाओ से आकीर्ण दिखाए जाने लगे। पश्चिमी क्षेत्र से लेकर पूर्व तक ये स्‍वरूप बने।

वास्‍तुविद्या, शिल्‍पप्रकाश आदि ग्रंथों में इस छवि को ''शिशुक्रीड़ा'' नाम दिया गया है। ऐसी छवि जिसमें नारी अपने शिशु को अपनी गोद में उठाए हुए हो। ये छवियां दुग्‍धपान कराती भी दिखाई जाती। इनका मूल मत्‍स्‍यपुराण का पार्वती और वीरक-स्‍कंद का आख्‍यान है अथवा कालिदास के कुमारसम्‍भव की पृष्‍ठभूमि, कहा नहीं जा सकता मगर यह लगता है कि शैलसुता ने अपने सुत को लोरी सुनाकर या क्रीड़नक के सहारे बहलाकर जो वात्‍सल्‍य प्रदर्शित किया, वह मूर्तिकारों की प्रेरणा बन गई।

Yuga Karthick का आभार कि उन्‍होंने एक प्रतिमा की छवि भिजवाई है जिसमे खड़ी हुई मां अपने शिशु को गोद में उठाए हुए रुदन को शांत करवा रही है। उसके हाथ में शिशु है तो दूसरे में वह अपनी केशराशि के पास झुनझुना बजाकर उसको बहला रही है। इस छवि का तालमान तो स्‍मरणीय है ही, बनाने वाला शिल्‍पी जरूर लंबे कद का रहा होगा। वह अलंकरणों का भी प्रेमी रहा होगा, उसने सिर से लेकर पांव तक सुहागिन माता को अलंकृत किया है।

झीने वस्‍त्र भी दर्शनीय है मगर सबसे रूचिकर है ममतामयी वह छवि जिसमें मातृत्‍व का भाव हिलोर लेता अपनी प्रतीति दे रहा है। धनुषाकार स्थिति, एकाधिक भंगीय न्‍यास, शिशु का कोणाकार स्‍वरूप और बहलाव का अंदाज... वाह सच में एक भारतीय मां... जो शिशुरंजना होकर अपना रंजन कर रही है। देखियेगा, अपने आसपास और कौन-कौन से देवालयों की दीवारों पर मां-बेटे का ये रूप रूपाकार हो रहा है....।

राजस्थान का खजुराहो 'जगत का अम्बिका मंदिर'- प्रणयलीन प्रतिमाओं का भण्डार- डॉ. श्रीकृष्ण ‘जुगनू


राजस्‍थान का खजुराहो कहा जाने वाला उदयपुर का जगत मंदिर प्रणयलीन प्रतिमाओं का सुन्दर भण्डार है। प्रासादों में प्रणय प्रतिमाएं बनाने की परंपरा इसके निर्माण काल तक महत्व प्राप्त कर चुकी थी। देवकन्याओं, सुरसुन्दरियों को देवताओं के साथ विभिन्न मुद्राओं में दिखाया जाने लगा था, जिसका सुंदर उदाहरण यहां देखने को मिलता है। मंदिर में पान गोष्ठियां, चषक के साथ मधुपान, नर्तन, गायन, वादन सहित संगम-समागम के सरोकार जैसे कई दृश्य यहां शिलापट्टों पर उत्कीर्ण हैं। ये पूर्व मध्यकालीन सामाजिक परंपराओं और विलासी नागरक या नगरीय जीवन की प्रवृत्तियों की जीती-जागती तस्वीरें हैं।

देवालयों की शाखाओं को मिथुन मूर्तियों से सज्जित-मण्डित करने का प्रचलन इस काल में एक आवश्यक अंग हो चुका था। ऐसे में यहां भी विभिन्न थरों-शाखाओं का चित्रीकरण इन रूपों से करते हुए प्रासाद के बाह्य भाग को अलंकृत किया है। कंदुक क्रीड़ा, पदगत कंटकशोधन, सद्यस्नाता जैसी नायिका प्रतिमाएं यहां अपने लक्षणों के साथ-साथ सुरुचिपूर्ण सौन्दर्ययष्टि का जीवन्त साक्ष्य है।

यह मन्दिर सचमुच सांस्कृतिक-धार्मिक विरासत का विचित्र स्तम्भ कहा जा सकता है। पुरातत्व विभाग के अधीन यह संरक्षित है मगर यहां से मूल प्रतिमा गत दशक में चोरी चली गई। सभा मण्डप स्थित नृत्य गणपति की प्रतिमा को भी उखाड़कर ले जाने के प्रयास दो-तीन बार हो चुके हैं। ऐसे में यह प्रासाद मूर्ति तस्करों की नजर में है, सुरक्षा की दृष्टि से निरापद नहीं है। कितनी विडम्बना है कि जिसको सुरक्षित, संरक्षित रखने के प्रयास राजाश्रय में सदियों तक होते रहे, उसकी सुरक्षा के प्रयास अपर्याप्त है। क्या सार्वजनिक सम्पति किसी की नहीं होती, जिन प्रासादों की सुरक्षा के लिए लोगों ने प्राणों तक की परवाह नहीं की, उनकी प्रतिमाओं को चुराने के प्रयास उन्हें प्राण विहीन ही कर रहे हैं। फिर, जो प्रासाद विरासत के संरक्षण का पाठ पढ़ा रहा है, उसकी अनदेखी विचारणीय है।

जगत में विरासत संरक्षण का पाठ :

राजस्थान की मन्दिर-विरासत में जगत गांव के जगदंबिका प्रासाद का स्थान अतीव महत्वपूर्ण है। इसे राजस्थान के खजुराहो के रूप में नामांकित किया गया है। उदयपुर जिला मुख्यालय से लगभग पचास किलोमीटर आग्नेय कोण में कुराबड़ के पास जगत गांव के बाहर बना यह अपने अंक में लगभग एक हजार साल की कला, धर्म और आनुष्ठानिक स्मृतियां संजोये हुए है। मानव मन की आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए आवश्यक ऊर्जा-शक्ति, सृष्टि की निरन्तरता के लिए अपरिहार्य काम-शक्ति और जीवन के धारणा ध्येय के लिए अपेक्षित धर्म-शक्ति का यह जीता जागता उदाहरण है। यूं भी प्रासाद स्थापत्य की बुनियाद इन तीनों ही वांछित वर्गों की पूर्ति में सहायक स्वीकारी गई है। ये वर्ग हमारी सात्त्विक विरासत है जिनका सम्बन्ध मानवीय भावों से है और ये सांस्कृतिक तत्व की तरह मानव को अपने सभ्य समाज से जन्मतः: सुलभ होते हैं।

पुरखों का लिखा है विरासत को बचाए रखने का संदेश :

यह मन्दिर प्रदेश की उन स्थापत्य रचनाओं में स्वीकारा जाता है जो किसी हमले में ध्वस्त या खण्डित-भंजित होने से अक्षुण्ण रहा। बल्कि, विरासत को अक्षुण्ण रखने सहित उसके संरक्षण-संवर्धन के जीवनोपयोगी मूल्य और पुण्यफल का पाठ भी पढ़ा रहा है। यही वह प्रासाद है जिसके स्तम्भ पर आज से लगभग 1054 वर्ष पूर्व तत्कालीन महारावल अल्लट के शासनकाल (विक्रम संवत् 1017, ईस्वी 960) पुरखों की विरासत को बचाए रखने के संदेश के साथ-साथ इस पुण्यकर्म के स्वाभाविक फल को भी आदर्श रूप में लिखा गया है :
वापी-कूप-तडागेषुु-उद्यान-भवनेषु च।
पुनर्संस्कारकर्तारो लभते मूलकं फलम्॥
इस श्लोक में विरासत के महत्व के स्थलों के रूप में सीढ़ी वाले कुएं या बावड़ी, कुआं, तालाब-तड़ाग जैसे जलस्रोत, पर्यावरण को शुद्ध रखने वाले उद्यान और बावडिय़ां तथा सार्वजनिक हित के विश्रान्ति भवन, शैक्षिक स्थल, आश्रमीय मठ, देवालय आदि के संरक्षण के भाव से उनका पुनर्संस्कार करने की प्रेरणा देते हुए कहा गया है जो कोई संकल्पित होकर पुनरुद्धार करवाता है तो वह उसी फल से लाभान्वित होता है जो कि मूल कार्य करवाने से मिलता है। यह वह ध्येय वाक्य है जो विगत दो हजार सालों से विश्व समुदाय को अपनी विरासत की अनदेखी नहीं करने की प्रेरणा दे रहा है। मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त की जूनागढ़ स्थित सुदर्शन झील के पुनर्संस्कार से ऐसा ही पुण्यफल क्षत्रप शासक रुद्र दामन (105 ई.) और प्रान्तपाल चक्रपालित (455-56 ई.) ने प्राप्त किया था। बाद में यही फल-कथन हमारी विष्णु-धर्म, बृहस्पति, यम और शंखलिखित जैसी स्मृतियों और आग्नेय, विष्णु-धर्मोत्तर, गरुड आदि पुराणों में वर्णित मानव-कर्तव्यों का निर्देश वाक्य भी बना। हयशीर्षपञ्चरात्र में तो यह तक कहा गया कि वापी, कूप, तालाब, देवालय, प्रतिमा, सभागृह आदि का समय-समय पर संस्कार करवाते रहना चाहिए। इससे पुण्यात्मा को मूलकार्य की अपेक्षा सौ गुना पुण्य नि:सन्देह मिलता है।

अम्बिका देवी का समर्पित है जगत मंदिर:

जगत का यह प्रासाद मूलत: अम्बिका देवी को समर्पित है। यह महिषासुर मर्दिनी के स्वरूप और मन्दिरों की उसी परंपरा में बना है जो कि उत्तर-पश्चिमी भारत में बहु लोकप्रिय परिपाटी के रूप में व्यवहार्य रही। हालांकि राजस्थान देवी के इस रूप के प्रति आस्था की विरासत लगभग दो हजार सालों सहेजे हुए है। हर्षोत्तरकाल में क्षत्रियों ने जब अपने राजवंशों को क्षेत्रीयता के अनुसार स्थापित करने का प्रयास किया तब इस तरह इष्ट कुलदेवियों और शक्तिस्थलों को बनाए जाने लगे बल्कि, निर्माण की यह परंपरा बहुत बलवती रही। योगिनियों से लेकर मातृ देवियों, लीला देवियों और शास्त्रीय रूप में स्वीकृत लोक माताओं के भी मन्दिर सामने आए, भले ही पंचायतन शैली के मन्दिर ही क्यों न हो।

नवीं सदी में बन चुका था यह मंदिर:

यह मन्दिर कब बना, ज्ञात नहीं। चार अभिलेख यहां से मिले हैं, उनमें इसके जीर्णोद्धार या संस्कारों का ही जिक्र है। इनमें से प्राचीन ज्ञात अभिलेख विक्रम संवत् 1017 का है जबकि इससे पूर्व यह मन्दिर बन चुका था। प्रमाण सिद्ध करते हैं कि यह 850 ईस्वी के बाद बन चुका था। यह समय प्रतिहार शासक महिपाल का था। प्रतिहारों को उनके अभिलेखों में ‘परम भगवति भक्तो’ या शाक्त लिखा गया है। फिर, यह मन्दिर उनके ग्यासपुर के देवी मन्दिर जैसी स्थापत्य रचना को ग्रहण किए है। यही नहीं, प्रतिहारों के 843 व 816 ईस्वी के दानपत्रों में चतुर्भुज गोधासना देवी प्रतिमाएं उत्कीर्ण हैं। इस काल के शिल्पशास्त्रों के अनुसार गोधासना वे देवी प्रतिमाएं हैं जिनको गोह नामक जन्तु पर आरूढ़ दिखाया जाता है जैसा कि बुचकला-जोधपुर के 873 ईस्वी में बने शिवालय में चतुर्भुजी पार्वती गोह पर आरूढ़ है। यही स्वरूप जगत के मन्दिर के प्रवेशद्वार के दक्षिण-पूर्वी मण्डोवर भाग में षड्भुज, पद्मासनस्थ पार्वती का है जो कि गोधासना है, हालांकि इसके निर्माणकाल पर विशेष विचार की जरूरत है किन्तु यह तय है कि यह नवीं सदी में बन चुका था और निर्माण के कुछ समय बाद ही इसके जीर्णोद्धार और पुन: ध्वजा सहित कलशारोहण जैसे कार्यों से इसके सौन्दर्य सहित अर्चना के स्वरूप को निरन्तर रखा गया।


देखने को मिलते हैं देवी के कई रूप:

अम्बिका की पृष्ठभाग में उत्कीर्ण प्रतिमा शुक सहित है। शुक्रप्रिया अम्बिका का यह स्वरूप पश्चिमी गुहा या लयन प्रासादों से लेकर शास्त्रों तक में वर्णित है। वैसे यहां शुम्भहन्त्री देवी रूप में महिष का स्वरूप पशु और मानवीय दोनों रूपों में मिलता है। जगत के इस मन्दिर की अन्य प्रमुख रचनाओं में मकरमुख प्रणाल, शिखर की संवरणाएं और जलान्तर सहित शिखर विधान मुख्य है। यह नागर शैली की स्थानीयता का प्रतिनिधित्व करते हुए निरूपित किया गया है।
प्रतिहार कालीन यह प्रासाद उन अखंड रचनाओं का प्रतिनिधित्‍व करता है जिनमें शिखर अभी भी विद्यमान हैं। मनुष्‍य की शिरोरचना की तरह ही इस प्रासाद का शिखर गढ़ा गया है और लगता है कि संपूर्ण अपेक्षित शिखर का प्रमाण एक-एक सूत सहित पहले कल्पित करके एक-एक पाषाणखंड भूमि पर ही गढ़ा गया और फिर शिखर पर चढ़ाया गया। अपराजित पृच्‍छा में इस प्रकार के शिखर विधान का अंतिम विवरण लिखा गया, यही विवरण 'कलानिधि' ग्रंथ के रूप में सूत्रधार गोविंद ने उद्धृत किया, विडंबना है कि हमारे पास ऐसे शिखर विधान का विशारद अब नहीं है, कलानिधि का संपादन करते समय मैं शिखर पर डाली जाने वाली कलाओं के नाम और उनके प्रमाण का ही अनुवाद करके रह गया, बहुत प्रयास किया कि कोई तो इनका खुलासा करे, मगर न हो सका,,, ऐसे प्रासाद का शिखर देखने पर आश्‍चर्य ही लगता है
आलेख:- डॉ. श्रीकृष्ण ‘जुगनू (दैनिक भास्कर के 19 नवम्बर, 2014 के अंक में प्रकाशित)

देवालयों के निर्माण की रूपरेखा- डॉ. श्रीकृष्ण ‘जुगनू


हमारे यहां देवालयों के कई प्रकार हैं। सांधार और निरंधार तो संज्ञाएं हैं ही, मगर लयन या लेण गृह उन गुफाआें के लिए कहा गया है जिनमें शुरू शुरू में आवास के साथ-साथ आराधना का सिलसिला शुरू हुआ था। गुप्‍तकालीन प्रमाण जाहिर करते हैं कि देवालयों के कई स्‍वरूपों का विकास हो चुका था। बृहत्‍संहिता और उसका आधार रही काश्‍यपीय संहिता में कैलास आदि दर्जनों प्रासाद शैलियों और स्‍वरूपों का वर्णन आया है। राजा भोज ने 1010 ई. के आसपास जब समरांगण सूत्रधार ग्रंथ की रचना की तो प्रासादों के देवानुसार स्‍पष्‍ट वर्गीकरण किया गया और इतने अधिक स्‍वरूपों का वर्णन किया कि उनको यदि मॉडल रूप में भी बनाया जाए तो एक भारत और चाहिए। हजारों रूप है प्रासादों के न्‍यास-विन्‍यास के। इसलिए कोई एक मंदिर दूसरे से वैसे ही नहीं मिलता जैसे एक सूरत दूसरी सूरत से नहीं मिलती। इसके विमान, देवायतन, देवालय, प्रासाद, मन्दिर आदि पर्याय हैं।
कैसे होता था इनका निर्माण ?
 शास्‍त्रों में इनके तलच्‍छन्‍द और स्‍वरूप का ही वर्णन मिलता है, मगर ये सच है कि प्रासादों के निर्माण से पूर्व उनका नक्‍शा तैयार किया जाता था। नक्‍शों का प्रारंभिक जिक्र 'मिलिन्‍द पन्‍हो' में आता है। तब नगर वढ्ढकी या नगर निवेशक (नगरवर्धकी) भूमि के चयन से लेकर वहां पर नगर निवेश के लिए उचित मापचित्र तैयार करता था और उपयोगी, अावश्‍यक भवनों की योजना बनाकर नवीन नगर बसने के बाद दूसरी जगह चला जाता था। सौन्‍दरानन्‍द नामक बौद्धकाव्‍य और उसके समकालीन हरिवंशपुराण में 'अष्‍टाष्‍टपद' के रूप में नगर, राजधानी आदि की योजना कल्पित करने का प्रसंग आया है। यह 8 गुणा 8 यानी चौंसठ पद वास्‍तुन्‍यास होता था...। इसी आधार पर कपिलवस्‍तु और द्वारका की योजना तैयार हई थी।
राजा भोज के काल में ही भोजपुर का शिव मन्दिर बना। यह अपने सौंदर्य और शिल्‍प ही नहीं, स्‍थापत्‍य के लिए भी एक मानक शिवायतन के रूप में जाना जाता है। इस मंदिर की विशेषता यह भी है कि इसके स्‍थापत्‍य के लिए पास की एक चट्टान पर नक्‍शा तैयार किया गया था। मंदिर की पूरी योजना को अलग-अलग रूप में तय किया गया और शिवलिंग से लेकर द्वार, दीवार, शिखर तक को परिकल्पित किया गया। समरांगण सूत्रधार में जिन प्रासादों के रूपों का लिखा गया है, उनमें शिवालयों के प्रसंग में इस प्रासाद की रचना और उसके नक्‍शे से शब्‍दों सहित योजना विधान को समझा जा सकता है।

यह प्रासाद दर्शन मेरे समरांगण सूत्रधार के अनुवाद (प्रकाशक- चौखम्‍बा संस्‍कृत सीरिज ऑफिस, वाराणसी) के समय बहुत काम आया। दो साल पहले, 2012 के अगस्‍त के पहले हफते में मैं भोपाल के कलाविद श्री सुरेशजी तांतेड और डॉ. महेंद्र भानावत के साथ भोजपुर पहुंचा तो यह सब देखकर विस्मित हो गया। मेरे आग्रह पर मित्र Gency Chaudhuri ने इन नक्‍शों के चित्रों को भेजा है,,, आप भी प्रासाद स्‍थापत्‍य विधान के मूलाधार तलच्‍छन्‍द की योजना का आनंद उठाइयेगा।


-डॉ. श्रीकृष्ण ‘जुगनू'

बुधवार, 24 दिसंबर 2014

नागर, द्राविड और वेसर प्रासाद शैलियां

मंदिरों के निर्माण का अपना वैशिष्‍ट्य रहा है। युगानुसार भी और क्षेत्रानुसार भी उनका निर्माण होता रहा है। वे तल या अधिष्‍ठान से लेकर शिखर या स्‍तूपी तक अपना आकार मानव के शरीर के रचना की तरह ही अपना स्‍वरूप रखते हैं। उनकी सज्‍जा या अलंकरण का अपना खास विधान रहा है और इसके लिए शिल्पियों ने अपने कौशल को दिखाने में प्रतिस्‍पर्द्धा सी की है।

प्रासादों के स्‍वरूप के निर्णय के लिए हमें हमारे शिल्‍प ग्रंथों को जरूर देखना चाहिए जिनमें उनके रचनाकाल से पूर्व की परंपराओं को लिखा गया है। मयमतं हो या मानसार या फिर शैवागम अथवा वैष्‍णवागम हों, उनमें प्रासादों की रचना के लिए पर्याप्‍त विवरण मिलता है। दक्षिण के नारायण नंबूदिरीपात ने 'देवालय चंद्रिका' में प्रासादों के शिल्‍प के लिए निर्देश किए हैं तो सूत्रधार मंडन ने 'प्रासादमण्‍डनम्' में प्रासादों के संबंध में समग्र योजना और कार्यविधि को लिखा है। संयोग से इन दोनों ही ग्रंथों के संपादन का मुझे सौभाग्‍य मिला है।

इन दिनों शिल्‍परत्‍नम पर काम चल रहा है। इसकी रचना 16वीं सदी की हैं। इसमें कहा गया है 1. नागर, 2. द्राविड और 3. वेसर शैलियों के मंदिर भारत में बनते आए हैं, मगर सबका अपना अपना स्‍वरूप रहा है। लाख प्रयासों के बावजूद शिल्पियों ने अपने ढंग से ही मंदिरों की रचना की है। मानव की तरह ही उनके रूप रंग में कुछ न कुछ भेद मिलता ही है। यही कारण है कि समरांगण सूत्रधार में मंदिरों के संबंध में जो विवरण है, उनको यदि नमूने के तौर पर भी बनाया जाए तो एक भारत कम पड़ जाए...। ऐसा ही विस्‍तृत विवरण ईशान शिवगुरुदेव पद्धति में मिलता है जिसके उत्‍तरार्ध का क्रियापाद अधिकांशत: देवालयों से संबंध रखता है।

शिल्‍परत्‍नकार श्रीकुमार का मत है कि हिमालय से लेकर विंध्‍याचल तक सात्विक गुणों के नागर, विंध्‍याचल से लेकर कृष्‍णा तक राजस गुणों के द्राविड और कृष्‍णा से लेकर कन्‍यान्‍त तक तामस गुणों वाले वेसर शैली के प्रासादों के निर्माण की परंपरा रही है -
 
नागरं सात्विके देशे राजसे द्राविडं भवेत्। वेसरं तामसे देशे क्रमेण परिर्की‍तिता:।।
 
इसी प्रकार की मान्‍यताएं 8वीं सदी के ग्रंथ 'लक्षण सार समुच्‍चय' में आई हैं...।
आज इतना ही, कभी फिर।
 
- डॉ: श्रीकृष्‍ण जुगनू

द्राविड़ प्रासाद : रचनात्‍मक स्‍वरूप

शिल्‍प शास्‍त्रों में जिन तीन प्रकार के प्रासादों का उल्‍लेख मिलता है, उनमें द्राविड या द्रविड़ शैली के प्रासाद विंध्‍याचल से कृष्‍णा तक के प्रदेश में करणीय बताए गए हैं।
 
अजितागम नामक शैव आगम में आया है कि वे प्रासाद जिनमें कण्‍ठ आदि का निर्माण अष्‍टकोणीय रूप में हो, वे द्राविड़ प्रासाद कहे जाते हैं :
 
कण्‍ठात्‍प्रभृति चाष्‍टाश्रं द्राविडं परिकीर्तितत्। (क्रियापाद, 12, 67)
 
इसी प्रकार सुप्रभेदागम में आया है : 
 
ग्रीवमारभ्‍य चाष्‍टाश्रं विमानं द्राविडाख्‍यकम्। (सुप्रभेद. 1, 31, 40)
 
करणागम में मामूली भेद से कहा गया है : 
 वेदि प्रभृति चाष्‍टाश्रं द्राविडं चेति कीर्तिततम्। (करण. 1, 7, 117)
 
इन्‍हीं प्रासादों में अन्‍य रूपों को आरोपित करते हुए अन्‍य रूपों का विन्‍यास किया जाता रहा है, जैसे सौभद्र, स्‍वस्तिकबंध, सर्वतोमुख, सार्वकामिकम् आदि। शैवागमों में इस प्रकार की मान्‍यताओं का सर्वाधिक वर्णन मिलता है, कारण है कि शिवलिंग की स्‍थापना और उनका पूजा विधान का प्रसार करना। कामिकागम इनमें सबसे पुराना विवरण लिए है और अंशुमद्भेदागम जैसे अन्‍य आगम उसी का आश्रय ग्रहण किए हैं। मयमतं, मानसार जैसे शिल्‍पग्रंथ और तंत्र समुच्‍चय आदि में भी यह विवरण मिल जाता है।
 
द्राविड़ प्रासादों में भी मनुष्‍य के शरीर के अंगों का ऊर्ध्‍वाधर विन्‍यास मिलता है। एक प्रासाद अपने रूप में मानवीय संरचना ही लिए होता है। एक द्राविड प्रासाद का रेखांकन इस मान्‍यता को सिद्ध करने में सहायक है। देखियेगा कि चरण से लेकर सिर तक के अंग प्रासाद में कौन-कौन से और कैसे-कैसे होते हैं, ये ही पर्यायवाची शिल्‍पग्रंथों में प्रयुक्‍त हैं -
 
  • उपपीठ (पांव तल),
  • अधिष्‍ठान (तल से ऊपरीभाग जिसमें पीठ, उपान, प्रति अंग होते हैं),
  • जानु मण्‍डल (जंघा भाग),
  • पादवर्ग (पांव, स्‍तम्‍भ, अंघ्रि, चरण),
  • कराकरम् (भुजाएं, न्‍यग्रोध),
  • प्रस्‍तार व बाहुमूलम (भुजाएं),
  • कण्‍ठ (गल या ग्रीवा),
  • गुल (ठुड्डी),
  • आस्‍य (मुख भाग),
  • महानासी या अल्‍पनासी (नाक, नासिका),
  • कर्ण (कान),
  • शिखर (सिर का भाग),
  • शृंग, उरुशृंग (शिरोपरिभाग),
  • स्‍तूपी (सिर के केश आदि),
  • शिखा या ध्‍वजा (सिर के ऊंचे, खुले केश)।
 
प्रासाद का यह रूप जहां भी मिलता है, वह एक काया रचना ही लगता है, देखियेगा। भारतीय और मिस्र आदि के प्रासादो में तुलनात्‍मक रूप में यह अंतर बहुत अधिक है। इसके अंगों के ताल और मान पर हजारों श्‍लोक मिल हैं और सबमें अनुपात पर ही जोर दिया गया है,,, वह विवरण कभी फिर।
 
- डॉ. श्रीकृष्‍ण 'जुगनू'