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शनिवार, 21 मार्च 2015

परमारों का एक दुर्लभ अभिलेख

मित्रो, परमार राजवंश ने अपने समय को बहुत शानदार ढंग से जीया है, कई गौरवशाली राजा इस वंश में हुए हैं। इस वंश की उत्‍पत्ति भी अंग्निवेदी से मानी गई है... इस वंश के उद्भव के साक्षी के रूप में Kutch Itihas Parisad ने मुझे एक दुर्लभ शिलालेख भेजा है, उनके इस उपहार के लिए आभार,,, इसमें परमारों के मुनि द्वारा नामकरण का विचार आया है।
 
इसके अनुसार परमार धवल ने वल्‍लाल को मारा जो कि मालवा का शासक था। यह अन्‍य शासकों के बारे में भी जानकारी देती है,, प्रारंभिक देवनागरी लिपि के रूप में इसकाे देखना चाहिए जबकि ई की मात्रा को तो लिखा जाता था मगर ऐ की मात्रा को अक्षर से पूर्व ही खड़ी पंक्ति के रूप में लिखा जाता था। यह संस्‍कृत में लिखा गया है। 

इसका कुछ पाठ इस प्रकार पढ़ा जा सकता है--

इतश्‍च, अस्ति श्रीमानर्बुदाख्‍योद्रि मुख्‍य: शृंगश्रेणिर्बिभ्रदभ्रलिहो य:।
वृद्धिं विंध्‍य: किंपुनर्यात्‍य सावित्‍यादित्‍यस्‍य भ्रांतिमंतर्विधत्‍ते।। 10।।
तत्राथ मैत्रावरुणस्‍य जुद्वतश्‍चंडोग्नि कुण्‍डात्‍पुरुष: पुरो भवत।
मत्‍वा मुनींद्र: परमारणक्षमं स व्‍याह रत्‍तं परमार संज्ञया।। 11।।
पुरा तस्‍यान्‍वये राजा धूमराजाद्वयो भवत्।
येन धूमध्‍वजेन दग्‍धा वंशा: क्षमाभृताम्।।
12।।
अपरेपि न संदग्‍धा धधूध्रुव भटादय।
जाता: कृताहवोत्‍साह बाहवो बहवस्‍तत।। 13।।
तदनन्‍तरमभ्रंगित कीर्तिसुधा सिन्‍धु: शुंधित व्‍योमा।
श्रीरामदेवनामा कामादपि सुन्‍दर: सो भूत्।। 14।।
तस्‍मान्‍महीवविदितान्‍य कलत्र गात्र स्‍पर्शोयशो धवल इत्‍यवलम्‍बते स्‍म।
यो गुर्जरक्षितिपति पक्षमाजौ बल्‍लालमालभत मालवमेदिनीद्रम्।। 15।। इत्‍यादि।
 
बहुत खोजबीन से विदित हुआ है कि यह अभिलेख वीर विनोद नामक इतिहास ग्रंथ के भाग द्वितीय में शेष संग्रह के 11वें क्रम पर 1884 ई में प्रकाशित हुआ है, यह 14वीं सदी के पूर्वार्द्ध के किसी वर्ष का होना चाहिए, इसमें परमारों के मूल पुरुष धूमराज को बताया गया है और रामदेव के लिए कहा गया है वह अपने वंश में बहुत सुंदर था, उसके पुत्र धवल ने कुमारपाल के शत्रु मालवा के बल्‍लाल का हनन किया था, उसके पुत्र धारावर्ष ने कोंकण के राजा का वध किया, उसके अनुज प्रहलादन की वीरता व सोमसिंह के शौर्य का विवरण भी यह प्र‍श‍स्ति देती है..., हालांकि इस प्रशस्ति के अनेक अक्षर खंडित है और संवत की जानकारी देने वाली पंक्ति भी नदारद है... आबू वसिष्‍ठ के यज्ञ के लिए महशूर है किंतु इस प्रशस्ति में वसिष्‍ठ के पिता, उर्वशी के स्‍वामी मित्रावरुण को यज्ञकर्ता कहा है... वे यायावरी के लिए ख्‍यातनाम रहे।

तुसाम का तड़ागोत्‍सर्ग शिलालेख

हरियाणा में गुप्‍तकाल का एक अभिलेख आज से 140 साल पहले खोजा गया था। यह पहाड़ी पर लिखा गया था और इसको तुषाम या तुसाम अभिलेख के नाम से एशियाटिक सोसायटी सहित भारतीय पुरातत्‍व सर्वेक्षण विभाग के अधिकारियों ने नामांकित करते हुए प्रकाशित किया। यह एक ऐसा गिरि-अभिलेख है जिसमें चक्र को वैष्‍णवीय प्रतीक के रूप में उत्‍कीर्ण किया गया है। तड़ाग बनवाकर उसके समीप की पहाड़ी को उसका शिखर मानते हुए उस पर लेख सहित चक्र अंकित किया गया, यह कालांतर में वैष्‍णवीय परंपरा में स्‍वीकार्य रहा। यही नहीं, इसमें सात्‍वतों का जिक्र है और सात्‍वत संहिता, सुदर्शनसंहिता, विष्‍णुसंहिता आदि में भी वैष्‍णवीय चक्र के रूप में सुदर्शन की बड़ी महिमा लिखी गई है, यही नहीं, वैष्‍णवीय प्रासाद, तड़ाग आदि में भी शिखर पर स्‍थान देने का निर्देश किया गया। यही नहीं, इसमें वैष्‍णवीय योग के संबंध में भी लिखा गया जो कि विष्‍णुपुराण, गीता आदि में स्‍मरणीय है। किंतु, इस प्रतीक को शिलालेख की खोज के दौरान प्रथमत: बौद्ध या सौर चिन्‍ह के रूप में देखा गया।

हाल ही श्री रणवीरसिंहजी ने इस तुषाम अभिलेख की एक तस्‍वीर  फेसबुक पर पोस्‍ट की, मेरी जिज्ञासा ने इस लेख के सारे संदर्भों को खोजने की दिशा में प्रेरित किया और जो जानकारियां पुरातत्‍व विभाग सहित प्रो. जेएफ फ्लीट आदि के संग्रहों से मिल सकी, उसको मैंने श्री रणवीरसिंहजी की फेसबुक वॉल पर तो लिखा ही, किंतु यह भी सोचा कि इसके बारे में अपने मित्र भी जान सके। उन सभी मित्रों को भी इस शिलालेख को उसके वर्तमान चित्र और मूल पाठ, अनुवाद सहित दिखाना चाहता हूं जो इसके बारे में ज्‍यादा नहीं जानते। इस अभिलेख की प्रारंभिक जानकारी जनरल अलेक्‍जेंडर कनिंघम ने 1875 ई. आर्कियोलॉजी सर्वे ऑफ इंडिया के जिल्‍द 5 (पृष्‍ठ 138) से दी। कनिंघम ने तत्‍कालीन पद्धति के अनुसार शिलामुद्रण के साथ बाबू प्रतापचंद्र घोष कृत लेख का अनुवाद प्रकाशित किया।
इसका पाठ इस प्रकार है--

जितम भीक्ष्‍णमेव जाम्‍बवतीवदनारविन्‍दोर्ज्जिताळिना।
दानवांगाना मुखाम्‍भोज लक्ष्‍मी तुषारेण विष्‍णुना।।
अनेक पुरुषाभ्‍यागतर्य्य सात्‍वतयोगाचार्य्य
भगवद्भक्‍त यशस्‍त्रात प्रपोत्रस्‍याचार्य्य विष्‍णुत्रात
पाैत्रास्‍याचार्य्य वसुदत्‍तपुत्रस्‍य रावण्‍यामुत्‍पन्‍नस्‍य
गोतम सगोत्रस्‍याचार्य्यापाद्धयाय यशस्‍त्रातान्
जस्‍याचार्य्य सोमत्रातस्‍येदं भगवत्‍पादोपयोज्‍यं
कुण्‍डमुपर्य्यावस्‍थ: कण्‍डं चापरं।।

इन संस्‍कृत पंक्तियों का आशय है कि-
 
1. '' जाम्‍बवंती के मुखरूपी कमल के लिए शक्तिमान भ्रमर के समान तथा दानवों की स्त्रियां के मुखरूपी कमल की शोभा के विनाश के लिए तुषार स्‍वरूप भगवान विष्‍णु द्वारा पुन-पुन: विजय प्राप्‍त की गई।

2. भगवान के चरणों के उपभोग के लिए निर्मित यह तडाग तथा इसके ऊपर निर्मित भवन तथा दूसरा तडाग आचार्य सोमत्रात की कृति है, जो कि पूर्व पीढियों के विविध लोगों के उत्‍तराधिकारी, महापूजनीय सात्‍वत तथा योगदर्शन के आचार्य तथा भगवान के परम भक्‍त यशस्‍त्रात के प्रपोत्र है, आचार्य विष्‍णुत्रात के पोत्र रावणी से उत्‍पन्‍न आचार्य वसुदत्‍त के पुत्र हैं, गोतम गोत्र के हैं तथा आचार्य एवं उपाध्‍याय यशस्‍त्रात के अनुज हैं।''
मित्रों को याद रहे कि हरयाणा में तुशाम गांव के ठीक पश्चिम में एक चढ़ान युक्‍त पहाड़ी है जो भूमिस्‍तर से एकाएक प्रारंभ होती है और लगभग 800 फीट ऊंचाई तक जाती है, वर्तमान लेख पहाड़ी के पूर्वी भाग में लगभग आधी ऊंचाई पर एक शिलास्‍तर पर अंकित है। यह लेख किसी शासक से संबंधित नहीं, इसमें कोई ति‍थि भी नहीं है लिपिशास्‍त्रीय आधार पर इसको चौथी शताब्‍दी के अंत में या पांचवीं सदी के प्रारंभ में रखा गया है। श्री रणवीरसिंह जी ने 1998 में पहाड़ी पर चढ़कर इस तस्‍वीर को लिया और अपने खजाने से हम जैसों के लिए सुलभ करवाया, उनका आभार मानना चाहिए... जय जय।

अहल्‍याबाई का शिलालेख

शिवपूजा में सदा निरत रहने वाली भगवती स्‍वरूपा अहल्‍या बाई का एक अभिलेख मित्रवर श्री राज्‍यपाल शर्मा (झालावाड़) ने भिजवाया है। यह जाम गेट महू के द्वार पर लगा है और देवनागरी के स्‍पष्‍टाक्षरों में संस्‍कृत भाषा में लिखा गया है। इसमें संवत लिखने में ही दो श्‍लोकों का प्रयोग किया गया है। विक्रम और शक दोनों ही संवतों का प्रयोग किया गया है, विक्रम संवत 1847 के माघ मास की 13वीं तिथि को इसको लिखा गया है। द्वार की प्रशंसा में मनोहर शब्‍द मात्र लिखा गया है।
मूलपाठ इस प्रकार है :
श्री।
श्रीगणेशाय नम:।।
स्‍वस्ति श्रीविक्रमार्कस्‍य संमत्
1847 सप्‍ताब्धिनागभू:।
शाके 1712 युग्‍मकुसप्‍तैक मिते
दुर्मति वत्‍सरे। माघे शुक्‍ल त्रयोदश्‍यां पुष्‍यर्क्षे
बुधवारे सुबा (स्‍नुषा)* मल्‍लारि रावस्‍य खंडेरावस्‍य वल्‍लभा।। 2।।
शिव पुजापरां नित्‍यं ब्रह्मप्‍याधर्म तत्‍परा।
अहल्‍यारग्राबबंधेदं मार्ग द्वार शुशोभनम़।। 3।।

अहल्‍याबाई ने कई निर्माण कार्य करवाए, उनमें द्वार रचना भी हुई है। इस शिलालेख में स्‍नुषा शब्‍द आया है जिसका आशय है कि पुत्रवधू,, संध्‍या सोमन ने इस इस शब्‍द की ओर ध्‍यान दिलाया है, तदर्थ आभार।

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

एक शिलालेख गुजरात से -


बारहवीं-तेरहवीं सदी तक हमारे यहां शिलालेखों, राजकीय आज्ञाओं, ताम्रानुशासनों को लिखने की एक शैली और पाठ का निर्धारण हो गया था, बिल्‍कुल वैसे ही जैसे आज सरकारी कामकाज में भाषा तय है। 'लेखपद्धति' नामक मध्‍यकालीन संग्रह ग्रंथ में ऐसे अभिलेखों के पाठ का दस्‍तावेजी संग्रह है जो शिलालेखों पर उत्‍कीर्ण किया जा चुका था या लिपिकार उनको अपना चुके थे। ऐसा ही एक शिलालेख गुजरात के Kutch Itihas Parisad की ओर से मिला है। जिज्ञासा है कि इसके पाठ को पढा जाए। इसका मूल पाठ मेरे पठन के अनुसार इस तरह होगा-


 * ज्‍ संवत् 1328 वर्षे श्रावण सुदि 2 शुक्रे (शुक्रवारे) अधेह श्रीमद
णहिल्‍लपाटका वेष्टित समस्‍त रा-
जावली समलंकृत महाराजाधिराज श्री
मदर्ज्‍जुनदेव कल्‍याण विजय
राज्‍ये तन्नियुक्‍त महामात्‍य श्रीमालदेवे श्रीश्रीकरणांदि
समस्‍त मु-
द्रा व्‍यापारान् परिपंथयति सतीत्‍युव काले प्रवर्तमाने श्रीघतघद्या
मंडलकरण प्रतिवर्ष्‍ष एव ग्रामे देवी श्रीराववी पादानां पुरतो
घांघणीया ज्‍जातीय बार बरीया सुत रवि सींहेन आत्‍म श्रेयार्थ वापी कारापिता।
कारापान 1600 शुभं भवतु।*

लेख पद्धति के अनुसार यह अभिलेख उस काल के व्‍यापारियों के संबंध में राजाज्ञा का सूचक होता है, ऐसे ही दो अभिलेख दरीबा-मेवाड़ की विश्‍व प्रसिद्ध खदान के पास सूरजबारी माता मंदिर से मिले हैं। दोनों ही पिता-पुत्र महाराजाओं के हैं, महारावल समरसिंह और रत्‍नसिंह (रानी पदि़मनी के पति) के हैं। सन् 1298 व 1302 के। भाषा और लिपि ही नहीं, पाठ भी लगभग समान है। संयोग ही है कि गुजरात के श्रावण शुक्‍ला द्वितीया, 1272 ई. के इस अभिलेख में भी देवी मंदिर के पास वापी या बावड़ी के निर्माण का जिक्र है। इसको अपने ही श्रेय के लिए रवि सिंह ने बनवाया था। यह निर्माण अनहिलवाड पाटन के शासक, समस्‍त राजावलि में विभूषित अर्जुनदेव के कल्‍याणकारी राज्‍यकाल में हुआ था।

 विश्‍लेषक-डॉ. श्रीकृष्‍ण 'जुगनू'